उम्र बीतती नहीं... बस बहती है....!
कभी-कभी चुपचाप बैठे हुए जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो हैरानी होती है कि कितना कुछ गुज़र गया, और हमें पता तक नहीं चला।
उम्र...
ये कोई तारीखों की गिनती नहीं है।
ये तो हर वो लम्हा है जो हमने हँसते हुए, रोते हुए, भागते हुए या थक कर रुकते हुए जिया है।
बचपन में हम बड़ी उम्र की ख्वाहिश करते हैं, और बड़े होकर उसी बचपन को ढूंढते रहते हैं।
शायद इंसान की यही फितरत है — जो है, वो नहीं चाहिए; और जो बीत गया, उसकी कमी हमेशा रह जाती है।
हम दिन-रात मेहनत करते हैं।
कभी परिवार के लिए, कभी भविष्य के लिए।
कहते हैं — "थोड़ा और सह लूं, फिर चैन से जियूंगा..."
लेकिन वो "चैन" कभी आता ही नहीं।
और इसी इंतजार में हमारी उम्र बस निकलती जाती है... चुपचाप... धीरे-धीरे।
जब आईना हमें हमारी सफ़ेद होती ज़ुल्फें दिखाता है, तब जाकर समझ आता है कि वक्त कितनी तेज़ी से निकल गया।
पर उस वक्त को कोसने का क्या फायदा?
क्योंकि वो हर साल, हर महीना, हर दिन — हमारी कहानी का हिस्सा बन चुका होता है।
उम्र रुकती नहीं।
पर हम चाहें तो कुछ पल ऐसे जी सकते हैं जो हमेशा के लिए ठहर जाएं दिल में।
चाय की वो एक प्याली, किसी अपने के साथ बिताया एक शाम, या बस यूँ ही खुलकर की गई एक हँसी।
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उम्र को रोक नहीं सकते, लेकिन उसे जी तो सकते हैं।
हर दिन को सिर्फ गुजारना नहीं, महसूस करना जरूरी है।
क्योंकि जब ज़िंदगी की शाम आएगी, तो दौलत नहीं — वो लम्हे काम आएंगे जो दिल से जिए थे।
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